बिहार आँखों देखी: नोटबंदी – कितना मुश्किल है बिहार में कैशलेस अभियान को सफल बनाना

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एक तरफ जहाँ देश में डिजिटल क्रांति लाने की हर संभव कोशिश की जा रही है और केंद्र सरकार द्वारा इस योजना को सफल बनाने के लिए विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं बिहार का डिजिटल युग से नाता बहुत कमजोर और लचर दिखता है। किसी भी राज्य की प्रगति का पथ प्रशस्त करने में राज्य सरकार और वहाँ की स्थानीय प्रशासन का अहम किरदार होता है। बिहार एक ऐसा राज्य है, जिसकी दुर्गति की दास्तान यहाँ के निवासियों ने ख़ुद लिखी है, इसलिए बस यहाँ के प्रशासन को ज़िम्मेवार ठहराना सही नहीं होगा।

लोगों के आगे बढ़ने का रास्ता उनकी असाक्षरता ने रोक रखी है । यही कारण है कि आज भी यहाँ अधिकांश घरो में बिजली का बिल नहीं पहुँचने पर वो परेशान हो जाते हैं और बिजली विभाग के चक्कर काटने लगते हैं। विभाग के कर्मचारी भी उन्हें ख़ूब नचाते हैं, क्योंकि, इन कर्मचारियों को भी सिर्फ पेन चलाना सिखाया जाता है, कम्प्यूटर या मोबाइल पर ऊँगली नहीं। इसलिए इस बात से बेखबर कि मोबाइल से एक ऐप के ज़रिए उनका बिल आसानी से भरा जा सकता है, लोग बेचैन होकर भटकते रहते हैं। यहाँ के लगभग सभी पेट्रोल पम्प पर भी नकद काम ही होता है। बैंक कार्ड से भुगतान दूर की बात है, इसलिए पेट्रो कार्ड की बात करना दीवार पर सर पटकने जैसा काम है। आज के बिहार में आपको अधिकतर लोगों के हाथ में स्मार्ट फोन तो दिख जाएगा, लेकिन स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वाले स्मार्ट लोग बहुत कम दिखेंगे।

आज से 8 साल पहले मुंबई से पुणे आते समय एक ढाबे पर पैसे देते समय अनायास ही पूछ लिया था, “आप कार्ड लेते हैं?” । ढाबे वाले का जवाब था – “बिलकुल लेते हैं और क्रेडिट कार्ड भी लेते हैं, वो भी बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के।” यहाँ एक राज्य से तुलनात्मक अध्ययन इसलिए जरूरी है, क्योंकि, जब आप देश के सर्वांगीन विकास की बात करते हैं तो दूसरे राज्य के साथ आपको यह तुलना करना ही पड़ेगा कि बिहार राज्य विभिन्न क्षेत्रों में कितना पिछड़ा हुआ है। अगर दैनिक जीवनयापन में खरीददारी की बात करें तो यहाँ के शहर और जिले के मान्यता प्राप्त शोरूम भी कार्ड से भुगतान नहीं लेते। जहाँ 20-22 हजार नकद देकर समान खरीदना पड़े उस राज्य में सौ-दो सौ का पेमेंट कैशलेस होना एक स्वप्न जैसा लगता है। अगर किसी जगह कैशलेस भुगतान की सुविधा गलती से ढूँढने पर मिल भी जाती है, तो उसके यहाँ 2.5-3% का अतिरिक्त शुल्क अवश्य होता है।

इसका दूसरा कारण यह है कि आपके साथ मोलभाव के बहाने आपको साधारण सा हस्तलिखित बिल थमाकर यहाँ टैक्स की चोरी करना एक व्यावसायिक धंधा है। लेकिन सवाल उठता है कि यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या प्रशासन की ही क्यों? भ्रष्ट तंत्र से लिप्त लोगों को यह समझना होगा की इसमें उनका ही नुकसान है और इसके लिए उन्हें जागरूक होना पड़ेगा। सबसे पहले स्वयं को ईमानदार बनाना होगा। अगर आप यहाँ तक पढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं कि बिहार में सूचना क्रांति अभी पहुँची नहीं होगी या यह राज्य डिजिटल युग में बहुत पीछे रह गया है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें, पटना रेलवे स्टेशन का वाई-फाई भारत में सर्वाधिक इस्तेमाल होता है, लेकिन पॉर्न देखने के लिए। जिस राज्य में लोग इतने सक्षम हैं कि वाई-फाई का उपयोग गलत कारणों के लिए कर पायें, तो वही लोग सूचना क्रांति के इस युग में मोबाइल का उपयोग अच्छे कार्यो में भी कर सकते हैं। बशर्ते भुगतान के लिए डिजिटल माध्यम का विकल्प उनके पास मौजूद हो। दरभंगा जैसे शहर में रेलवे स्टेशन का वाई-फाई आ जाने से एक तरफ जहाँ ख़ुशी होती है, वही दूसरी तरफ इस बात से अत्यधिक निराशा होती है कि भविष्य में सरकार द्वारा दी गयी यह सुविधा भी गलत कारणों के कारण कहीं चर्चा का विषय ना बन जाये। इस शहर में इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद भी यहाँ के 95 प्रतिशत व्यापारी बस कैश में अपना सौदा करते हैं।

बिहार का कैश-लेस होना बहुत दूर की बात है, इस राज्य को लेस-कैश में सौदा करना वाला राज्य बनाने के लिए भी युद्धस्तर तौर पर काम करना होगा। ग्रामीण और क्षेत्रीय बैंकों की अनेकों शाखा को खोलने की आवस्यकता होगी। यहाँ के फुटकर और खुदरा व्यापारियों को नकद भुगतान का विकल्प देना होगा। सरकार द्वारा जारी UPI (Unified Payment Interface) मोबाइल ऐप को जन-जन तक पहुँचाना होगा और PayTm जैसे निजी ऐप कंपनियों को किसी राजनैतिक आईने से देखे बगैर, लेस-कैश खरीद-फरोख्त में उपयोग करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना पड़ेगा। दैनिक व्यापारी जो सड़क के किनारे सब्जी बेचते हैं, उन्हें मोबाइल के जरिये भुगतान का तरीका अपनाना होगा। अगर ऐसा हो पाया तो बिहार जैसे राज्य में यह एक क्रांति से कम बिलकुल नहीं होगा।

बिहार में कैश-लेस अभियान को सफल बनाने के लिए नितीश-लालू सरकार को बड़े पैमाने पर काम करना होगा। बिहार के विकास के लिए अब दोषारोपण की राजनीती बंद करके बिहार के उत्थान के लिए यथासंभव प्रयास देना होगा और जागरूकता अभियान चलाना होगा। ये सब इतना मुश्किल नहीं है, लेकिन वर्तमान बिहार सरकार से इतने अच्छे काम की कोई उम्मीद नहीं है। यहाँ की वर्तमान सरकार अपनी महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर कुछ नहीं सोचती और इसलिए बिहार में इस अभियान का सफल होना नामुमकिन तो नहीं है, लेकिन अत्यंत मुश्किल और कठिनाइयों से भरा अवश्य है।

पहले लेस-कैश और फिर देश को कैश-लेस बनाने की मुहीम अत्यंत प्रभावशाली होनी चाहिए। अगर सरकार द्वारा शुरू किये गए इस अभियान को सफल होते देखना चाहते हैं, तो इसमें हमें भी अहम् योगदान देना होगा। लोगों को इस बात से अवगत कराना होगा कि इस डिजिटल युग में आपके अधिकांश कार्य आपके फोन के जरिये हो सकते  हैं। बिहार में इस तरह का बदलाव लाने के प्रयास में यदि आप किसी व्यक्ति की मदद करते हुए उसे ये सब डिजिटल ऐप का उपयोग करना सिखाते है, तो वो भी एक बड़ा योगदान होगा।

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One thought on “बिहार आँखों देखी: नोटबंदी – कितना मुश्किल है बिहार में कैशलेस अभियान को सफल बनाना

  1. अच्छा और ज्ञानवर्धक लेख हेतु साधुवाद। Please don’t underestimate capability of Bihari people. Please also compare Bihar of 2016 and Bihar 2011. Bihar is suffering from “Chicken and Egg” debate. As I feel Egg of Chicken came first. I mean Merchants and Consumers.

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