अरविंद केजरीवाल – इंसान या राजनीती का नक्सलवादी

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अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने कम समय में ही राजनीती में बहुत सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन समय के साथ ये सुर्खियां नकारात्मकताओं से भरती चली गयी और आज इनकी राजनीती मोहल्ले के छुटभैये बदमाश नेताओ से भरी हुई है। काँग्रेस की घटिया देश चलाने की नीति और ताबरतोड़ घोटालों से ऊब चुके देशवासी जब आक्रोश में थे, तब अन्ना हज़ारे ने लोकपाल बिल को लेकर आंदोलन चलाया था और उससे देश के करोड़ों लोग जुड़े थे। उस आंदोलन से लोगों में एक विश्वास जगा था कि देश का आम आदमी अगर इकट्ठा खड़ा हो जाये तो बड़ी से बड़ी सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर सकता है।

उस आंदोलन को अपनी राजनीती की सीढी बनाकर बाहर निकले अरविन्द केजरीवाल एक रंगे सियार जैसा है, जिसने अपना रंग छोड़ने में बिलकुल देर नहीं लगायी। देश की राजधानी दिल्ली के लोगों को गुमराह करते हुए कांग्रेस की नीतियों का पुरजोर विरोध किया और लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली। लेकिन जितनी जल्दी केजरीवाल ने लोगों का मन जीता, उतनी ही जल्दी वो लोगों की नजर से गिरने में भी कामयाब हुआ है।

गौरतलब है कि अन्ना आंदोलन से देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग पुरे जोरशोर से जुड़े थे। समय रहते अरविन्द केजरीवाल नाम के रंगे सियार को जो लोग पहचान गए वो अपनी बुद्धिजीवी की उपाधि बचा गए और जो आज भी केजरीवाल की पूंछ पकडे हुए हैं, वो बुद्धिजीवी नाममात्र के रह गए हैं। ये लोग अपनी चाटुकारिता से केजरीवाल की फजीहत हर कदम पर करते रहते हैं, लेकिन केजरीवाल फिर भी जान बूझकर ऐसे बुद्धू-जीवियों से ही घिरे रहते हैं। अरविन्द केजरीवाल चलता फिरता झूठ का पुंलिदा है और ये कभी भी किसी के भी ऊपर मनगढंत आरोप मढ़ देता है। ये अपने बेकार के आरोपों से सम्बंधित फर्जी सबूत भी पेश करने की बात करता है, लेकिन इसके दावे और दस्तावेज हमेशा खोखले होते हैं। अरविंद केजरीवाल की बातों में कोई सच्चाई कभी नहीं होती और ना ही ये आज तक अपने लगाए किसी आरोप को सत्यापित कर पाया है।

अब सवाल यह उठता है कि इस कदर नीचे गिरने का कोई इंसान क्यों ठानेगा, अपनी छवि यूँही कोई क्यों बरबाद करेगा? इसका सीधा सादा जवाब है – अरविन्द केजरीवाल सिर्फ गन्दी राजनीती करना जानता है और वो हमेशा मीडिया में बने रहने का उपाय ढूंढता रहता है। चाहे इसके लिए देश के प्रधानमंत्री को ही गाली देनी पड़े या किसी देशद्रोही का ही समर्थन करना पड़े। फिर चाहे JNU हो या दलित आत्महत्या का मुद्दा, चाहे जातिगत राजनीती करनी हो या असहिष्णुता की अफवाह को हवा देनी हो, आप पाएंगे केजरीवाल हमेशा गलत और उलटे रास्ते पर ही चलता गया है। अरविन्द केजरीवाल की बची-खुची इंसानियत के ख़त्म होने की दास्तान भी उसी दिन खत्म हो गयी थी जब वो लालू यादव जैसे राजनीती के कलंक के साथ खड़ा हो गया था और उसका साथ देने में भी कोई कोताही नहीं बरती थी। केजरीवाल वर्तमान में दिल्ली छोड़कर हर राज्य में अपनी घटिया राजनीती का सिक्का चलाने की कोशिश कर रहा है और लोगों से दिल्ली की ही तरह झूठे और लुभावने वादे कर रहा है।

पठानकोट और उरी में जो आतंकवादी हमला हुआ उसके बाद पूरे देश में आक्रोश फैला हुआ था और हर देशवासी चाहता था कि आतंकवादी हमले का बदला हमारा देश पाकिस्तान से हर कीमत पर ले । वर्तमान सरकार ने जब पाकिस्तान के आतंकवादी कैम्प को सर्जिकल अटैक से चुन-चुन कर तबाह कर दिए थे, तब पूरे देश की जनता को अदभुत सुकून मिला था और जनता को इस बात की सबसे ज़्यादा ख़ुशी हुई थी कि वर्तमान भाजपा सरकार पहले की कांग्रेस सरकार की तरह सिर्फ बातें नहीं करती। लेकिन यहाँ भी विपक्ष का साथ देते हुए अरविंद केजरीवाल ने देश की सेना का अपमान किया। उनसे लगातार सबूत माँगे जो कि अत्यंत गोपनीय थे और जिससे देश की सेना सुरक्षा और उनके तकनीकियों का खुलासा हो सकता था। केजरीवाल ने तब नीचता की सारी हदें पार करते हुए सेना द्वारा किये गए सर्जिकल अटैक को भी फर्जी करार दे दिया था।

आज जब देश में काले धन के खिलाफ सरकार ने मुहिम छेडी है तो पिछले एक महीने में ऐसा कोई भी दिन नहीं गया जब अरविन्द केजरीवाल ने नोटबंदी के विरोध में ट्विटर पर या मीडिया में अपना कोई विरोधास्पद बयान नहीं दिया हो। अरविन्द केजरीवाल ने लोगों को भड़काने और अराजकता फ़ैलाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ा। हद तो तब हो गयी जब ट्विटर पर हमेशा झूठ फैलाने वाले एक बेकार सख्श के ट्वीट को भी इसने शेयर कर दिया। केजरीवाल इतना बेशर्म इंसान है कि उस व्यक्ति का झूठ पकडे जाने के बाद भी इसने अपना ट्वीट नहीं हटाया। ये काम काज करने के बजाय दिनरात ट्विटर पर नौटंकी करते हैं और नीचता की सारी हदें पार करते हुए केजरीवाल झूठ और अफवाहों को बढ़ावा देते रहते हैं।

अगर आप ध्यान दें, तो पाएंगे कि अरविन्द केजरीवाल की पूरी सरकार फ्रॉड है, लोगों की भावनाओं के साथ खेला हुआ एक धोखा है, छलावा है। ये एक एजेंडे के तहत काम करते हैं, जिसमें इनके चुने हुए कुछ चमचे पत्रकार और सोशल मीडिया के गुंडे भी हैं जो योजनाबढ़ तरीके से झूठ इन्टरनेट पर डालते हैं और केजरीवाल उस से पूछते हैं – ‘Is it true?'(क्या यह सच है?)। और इस तरीके से झूठ का प्रचार एक मुख्यमंत्री के वेरीफायड(सत्यापित) ट्विटर हैंडल से किया जाता है। ये जिस तरीके से बेकार ट्वीट और फर्जी न्यूज़ को साझा करता है, उस से साफ पता चलता है कि केजरीवाल संवैधानिक पद की गरिमा का बिलकुल ख्याल नहीं करता। इसकी पार्टी के विधायक महिलाओ का यौन शोषण करते हैं, बुज़ुर्गों पर हाथ उठाते हैं और गुंडे मवालियों की तरह लोगों को डराते धमकाते हैं। इसका पूरा मंत्रिमंडल चमचों, घोटालेबाजों और गुंडे मवालियों से भरा हुआ है, जो काम छोड़ कर दिन भर निकम्मों की तरह ट्विटर में अफवाह फैलाते हैं, केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री और दिल्ली के गवर्नर पर आरोप लगाते रहते हैं और कहते हैं कि ये उन्हें काम नहीं करने देते।

दरअसल केजरीवाल अपनी राजनीती को गटर की गन्दगी से भी बदतर स्तर पर पंहुचा चुका है। ये एक अत्यंत महत्वकांशी, धूर्त, धोखेबाज़ और झूठा इंसान है। इसने अपनी जिंदगी में सिर्फ लोगों को ठगा है। जो इंसान राजनीती करने के लिए अपने बच्चों की झूठी कसम खाता है, अपनी माँ को सरे आम चुनाव बाजार में वोट पाने की खातिर लेकर घूमता है, उससे आप अच्छाई की उम्मीद वैसे भी नहीं रख सकते। इनका राजनितिक भूख देश का प्रधानमंत्री पद के लिए लालायित है और उसके लिए ये किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार, है ताकि इसका नाम मीडिया जगत में चलता रहे। केजरीवाल आधुनिक युग की राजनीती में एक नक्सलवादी से कम बिलकुल भी नहीं है और ये दिल्ली के साथ देश को भी बर्बादी की तरफ ले जाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मनोरोगी केजरीवाल शायद ये भूल चूका है कि इंसान खुद की इंसानियत गिराने के बाद कितना ही प्रयत्न क्यों ना कर ले, उसको दुबारा नहीं उठा सकता। ऐसा नहीं है कि इस लेख में केजरीवाल को एक मुख्यमंत्री के मुताबिक इज्जत नहीं दी जा सकती थी, परंतु अरविन्द केजरीवाल की गिरी हुई सख्शियत इस से ज्यादा इज्जत की काबिल भी तो नहीं है। इस ढोंगी, बहुरूपिये राजनीती के नक्सलवादी से बचिए और इसकी हर तरह से उपेक्षा कीजिये। यह इंसान राजनीती में किसी भी पद के लिए उपयुक्त नहीं है और इसकी असली जगह किसी पागलखाने में होनी चाहिए।

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One thought on “अरविंद केजरीवाल – इंसान या राजनीती का नक्सलवादी

  1. चैतन्य कुमार

    जैसे शब्दों का प्रयोग इस राजनीति के सुवर के लिए किया गया है ये उसके क़ाबिल भी नहीं है । वैसे तो बहुत ही घटिया और गंदी गालियाँ भी दी जा सकती थी लेकिन मुख्यमंत्री पद का ध्यान रखते हुए केवल सुवर ही कहा ।

    हर एक बात सही लिखी है । लिखते रहिए

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