हम सब ट्रोल हैं

सोशल मीडिया का संसार, वास्तविक दुनिया को काल्पनिक तरीके से दिखाने वाले लोगों से भरी पड़ी है। जब मैंने यहाँ कदम रखा था, तो बिलकुल भी नही सोचा था कि मेरे वास्तविक नाम के अलावा भी मुझे अन्य कई नामों से जाना जायेगा। किसी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होना पहले कोई नाम नहीं देती थी, परंतु अब आप किसी भी पार्टी का समर्थन कीजिये, तो आपको लेबल तुरंत मिल जायेगा या यूँ कहिये थोप दिया जायेगा। मैं पहले भक्त कहलाया, फिर अंधभक्त और समयानुसार लोगों ने कभी गाली देते हुए संघी शिखंडी कहा तो कभी चड्डी गैंग का सदस्य। नमो अंडा, नमो छक्का और नमो हिजड़ा के अलावा अंग्रेजी में अक्सर Low IQ संघी भी से भी नवाजा गया। ऐसी कई गालियाँ आज भी सुननी पड़ती है जिसका जिक्र मैं यहाँ नहीं कर सकता। कभी अगर भाजपा नेताओं के विरोध में कुछ लिखा तो वहाँ भी गालियाँ ही खायी और मेरे जैसे सोशल मीडिया पर ऐसे कई लोग हैं जिनके साथ भी ऐसा ही सलूक होता है।

ऐसा नहीं है कि बस दक्षिणपंथी, वामपंथी, कांग्रेसी या किसी भी विचारधारा से प्रभावित लोगों को ही ऐसी गालियाँ सुननी पड़ती हैं, इस तरह की कुंठित मानसिकता से प्रभावित लोग हर जगह हैं और यह बौखलाहट पत्रकार से लेकर पार्टी प्रवक्ता और फिल्म जगत के कई हस्तियों में देखने को मिलती है। इसे सोशल मीडिया का कड़वा सच मानिये क्योंकि यहाँ कांग्रेसी वामपंथी, पत्रकार, फिल्म जगत की कुछ गिरी हुई हस्तियाँ और आपियों ने जिस तरह से एकतरफा सच और एक प्रकार का युद्ध छेड़ रखा है, वह अत्यन्त निंदनीय है क्योंकि वो आपसे बोलने और प्रतिक्रिया जाहिर करने का अधिकार छीनकर आपको गुंडा मवाली घोषित करने में लगे हुए हैं।

संसद हमारे देश में लोकतंत्र का मंदिर है, जहाँ पर देश की समस्याओं और योजनाओं के ऊपर चर्चा करने के लिए जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजती है। जब उसी मंदिर में वामपंथी विचारधारा से प्रभावित डेरेक ओ’ब्रायन जैसे लोग सोशल मीडिया पर सक्रीय लोगों का नाम लेकर उन्हें अपराधी घोषित कर देते हैं तो यह अत्यंत चिंता का विषय बन जाता है। डेरेक ओ’ब्रायन अपना प्रसंग एक ऐसे पत्रकार, स्वाति चतुर्वेदी, के किताब से उठाते हैं, जो खुद एक बड़ी ट्रोल है और इंटरनेट पर अगर आप ढूंढे तो उसके द्वारा दी गयी गालियों की ट्वीट्स भरी मिलेगी। संसद में इन महाशय ने दो आम नागरिक का नाम लेकर उन्हें अनायास ही अपराधियों  के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं नहीं जानता वो दोनों कौन हैं और सोशल मीडिया में मेरा उनसे कोई संपर्क नहीं है, लेकिन डेरेक ओ’ब्रायन और इस तरह से एजेंडा फ़ैलाने वाले इन दोहरी मानसिकता से ग्रसित लोगों की सच्चाई सबके सामने जरूर आनी चाहिए। क्योंकि इस तरह से आप मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं और अपने पद का दुरूपयोग करके देश की आम जनता को सबकी नज़र में अपराधी बना रहे हैं।

मुख्यधारा के पत्रकार, सांसद या किसी भी विधायक की ताकत को आप कभी कम नहीं आंक सकते। ये वही लोग हैं जिन्होंने JNU से उपजे एक अदने से देश विरोधी नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार और उमर खालिद को रातों रात नायक बना डाला था। ये सिलसिलेवार और योजनाबद्ध तरीके से महीनों से जारी एक मुहीम है, जिसमें कई एकाउंट्स ससपेंड कराये गए और न जाने कितनों को ऑनलाइन हिंसा का शिकार होना पड़ा। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के चमचों से लेकर बॉलीवुड की कई उच्छ्रंखल हस्ती इस मुहीम में शामिल है। ये अपनी पहचान और पहुँच को अपनी ताकत बनाकर उसका गलत फायदा उठाते हैं।


महिलाओं का पीछा करने और रेप की धमकी देने का इल्जाम कहीं से भी उठाकर किसी के भी सर पर मढ़ा जा रहा है। इसके परिणामस्वरुप दो लोगों को अनायास ही अपराधी बना दिया गया है, जिनकी मनोस्थिति कैसी होगी इस बात का सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। उनके इस एजेंडे की आड़ में उनके खुद के समर्थक गलत भाषा, औरतों से छेड़छाड़ और यहाँ तक कि अत्यंत घटिया और अश्लील पोस्ट करके लड़कियों और महिलाओ को शर्मशार करते रहते हैं। किसी भी राजनितिक विचारधारा से प्रभावित क्यों न हो, ऐसे लोग हर तरफ हैं जो सोशल मीडिया को गन्दा कर रहे हैं, फिर ये दोहरा व्यव्हार क्यों?
कुछ महीने पहले ऑनलाइन न्यूज ‘जनता का रिपोर्टर’ के संपादक रिफत जावेद ने कुमार विश्वास से की गयी बातचीत को youtube चैनल के जरिये दिखाया था। कुमार विश्वास की वाक पटुता का कायल मैं हमेशा से रहा हूँ। वो अक्सर झूठ भी इस तरह धाराप्रवाह हिंदी में बोलते हैं कि वो भी सच सा प्रतीत होता है। इस एकतरफा बातचीत में उन्होंने कहा था – ” ये लोग हमें और हमारी पार्टी की महिला समर्थकों को गालियां लिखते हैं और ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री फॉलो करते हैं”।
सबसे बड़े गालीबाज और ट्रोल तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हैं और स्वयं कुमार विश्वास भी कोई दूध के धुले नहीं। उनके कई ट्वीट उकसाने वाले होते हैं और वो भद्दे और गन्दी गालियाँ देने वाले अपने चमचों से वाद संवाद करते हैं। ऐसे लोगों के साथ वो और उनके मुख्यमंत्री तस्वीरें खिंचवाते हैं। उनकी पार्टी के स्टार प्रचारक रघु माँ बहन की गालियाँ देते हैं। मीका सिंह की गन्दी भाषा से पूरा देश परिचित है और विधायक कपिल मिश्रा के घटिया बयानबाज़ी के तो क्या ही कहने हैं। फिर ये दोगलापन नहीं तो और क्या है, जो अन्य लोगों के साथ किया जा रहा है और इस तरह के बिकाऊ पत्रकारों के माध्यम से हर जगह गलत धारणा फैलाई जा रही है।


कांग्रेस के तहसीन पूनावाला और दिग्विजय सिंह के गंदे ट्रोल क्यों नहीं दिखते लोगों को। मीडिया जगत के बड़े रिपोर्टर बरखा दत्त, स्वाति चतुर्वेदी और राणा अय्यूब मिलकर रवीना टंडन का ऑनलाइन उत्प्रीड़ण और उन्हें निचा दिखाने की कोशिश करते हैं, तब सबकी जुबान क्यों सील जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब ये तो नहीं कि अनुराग कश्यप, संजय भंसाली को पड़े थप्पड़ पर पूरे हिन्दू समुदाय को आतंकवादी कह देगा और श्रेया घोषाल जैसी सुरीली गायिका सोशल मीडिया में देश की सरकार को गुंडागर्दी की सरकार कहते हुए आग उगलेगी। ट्रोल शब्द एक गाली बन गया है, जिसे जब देखो किसी के ऊपर भी ये ठप्पा लगाकर चल देते हैं। सोशल मीडिया में दारूबाज, डॉन ऐसे नाम के कई फर्जी अकाउंट हैं, जिनका वास्तविक काम ही ट्रोल करना है। लेकिन, ऐसे अकाउंट को तो केजरीवाल फॉलो करते हैं। तो क्या खुद मुख्यमंत्री एक ट्रोल नहीं? अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर संसद में सरेआम दो लोगों का जीवन कठिन बनाने वाले डेरेक ओ’ब्रायन खुद गाली देते हैं। क्या वो खुद एक ट्रोल नहीं? देश के नामी पत्रकारों को सोशल मीडिया में नेताओ द्वारा दलाल कहा जाने लगा है, सोशल मीडिया में क्या पत्रकारों को दलाल कहलाना आहत नहीं करता?

डेरेक ओ’ब्रायन का संसद में ये मुद्दा उठाना एक निहायती ओछी मानसिकता को दर्शाता है, क्योकि, इस से उन्होंने देश के दो आम नागरिक को सबकी नज़र में गुंडा बना दिया है और उनकी माफ़ी से भी ये दाग धुलने वाला नहीं है। क्विजमास्टर के जरिये बच्चों में हीरो कहलाने वाले डेरेक ओ’ब्रायन पर लोग थू-थू करेंगे क्योंकि अहंकार से भरे ऐसे सांसद को अपना हीरो कहने में अब बच्चा-बच्चा शर्म महसूस करेगा।

ट्रोल शब्द के कयी मायने हैं और विभिन्न शब्दार्थ भी। हिंदी भाषा में इसे चकमा देने वाला या चक्कर देने वाला भी कहा जाता है। इंटरनेट पर इसकी कोई तर्कसंगत परिभाषा नही मिलेगी फिर भी ट्रोल ऐसे इंसान को कहा जाता है जो ज्वलंत, बाहरी या कटु पोस्ट डालता है। जिसके सवाल पूछने का तरीका व्यंग्य से भरा हो सकता है, लेकिन इतना तार्किक कि सामने वाले को निरुत्तर कर दे। ऐसा सच जिसका कोई काट ना हो, अगर कोई ऐसे पोस्ट करता है, तो उसे ट्रोल कहा गया है। वास्तविक दुनिया से लेकर सोशल मीडिया के काल्पनिक संसार में हम सबकी एक पहचान है। सवाल पूछना और किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया जाहिर करना हमारा हक़ है। अगर हमारा ऐसा करना आपको तकलीफ पहुँचाता है और इससे आपका छुपा हुआ दोहरा व्यक्तित्व सामने आ जाता है, तो ये बात हमें ख़ुशी देती रहेगी और हम आगे से और भी सवाल पूछेंगे। आप ब्लॉक करते रहिये, हम सीधी भाषा में सवाल उठाते रहेंगे। क्योंकि, हमारा लोकतंत्र हमें यह अधिकार देता है। इसके लिए आप हमें ट्रोल कहिये या कुछ और, हमें फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया का सबसे बड़ा वास्तविक और कड़वा सच यही है कि हम सब ट्रोल हैं।

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