ऑनलाइन संसार – खत्म होता शिष्टाचार

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इंटरनेट ने जिस गति से आधुनिक जीवन में अहस्तानांतरणीय जगह बनायी है, उतनी ही तेज़ी से इसने समाज में अश्लीलता पडोसी है। ऐसा नहीं है कि अश्लीलता के नाम पर केवल पोर्न व्यापार फला फुला है, बल्कि ऑनलाइन संसार ने समाज में अशिष्टता और उद्दंडता जैसी कुरीतियाँ भी भर दी है। ऐसे शब्द जो आम तौर पर बोलचाल की भाषा में हम इस्तेमाल नहीं करते हैं, उसका धड़ल्ले से इस्तेमाल होने लगा है। वायरल होने की होड़ में युवा रोज़ाना कुछ ना कुछ ऊटपटाँग हरकतों को अंजाम दे रहे हैं, क्योंकि हर किसी को कुछ अलग करके सुर्खियों में आना है, चाहे वो कितना भी खतरनाक या बेहूदगी से भरा क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि इंटरनेट पर कोई भी सोशल नेटवर्किंग साइट उम्र नहीं पूछती या यहाँ कॉन्टेंट फ़िल्टर नही रहते हैं। लेकिन, अगर किसी संगठन पर अश्लीलता के नाम का ही ठप्पा लगा हो और उसे खुले आम समाज में परोसा जाये, फिर आप अपने बच्चों को इसकी चपेट में आने से कैसे रोकेंगे? ऐसे शब्द जो सामान्यतः पारिवारिक समावेश में नही बोला जाना चाहिए, अगर आपके बच्चे उसे घर में बोलने लगे, तो जाहिर है हम शर्मिंदगी ही महसूस करेंगे।

इंटरनेट और सोशल मीडिया को बर्बादी की जड़ समझकर इसका दैनिक उपयोग सीमित कर देना या बच्चों पर इनका प्रतिबन्ध लगाना इसका समाधान कतई नहीं है। जरुरत है कि इंटरनेट और ऑनलाइन किसी भी साइट से तन्मय भट्ट जैसे मानसिक बीमार के चपेट में आप या आपके बच्चे नहीं आने पाए। सोचने वाली बात है, जिन्हें आम तौर पर फूहड़, अश्लील या बतमीज़ कहा जाता है, वैसे युवा को आपके बीच सामान्य और युवा वर्ग का बुद्धिजीवी बनाया जा रहा है। तन्मय भट्ट और इनके साथ कुछ बिगड़ैल लोग इंटरनेट, सोशल मीडिया और मनोरंजन की चीज़ों में गन्दगी को आम बना रहे हैं। जरा सोचिये, क्या आप अपने आम बोलचाल की भाषा में बक** शब्द का इस्तेमाल करते हैं? क्या आप ऐसे बॉलीवुड न्यूज जंकी से सिनेमा की खबरें, हास्य व्यंग्य या मजाक पढ़ना या सुनना पसंद करेंगे जिसने अपना नाम सोशल मीडिया में ‘बॉलीवुड गां*’ रखा हुआ है? ये कुछ ऐसे शब्द हैं जिनको खुले आम लिख नहीं सकते, फिर इन्हें बोलचाल में कोई कैसे इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन समस्या यह कि है ऐसे नाम काफी प्रचलित हैं, ये सोशल मीडिया जैसे कि ट्विटर और फेसबुक में वेरिफायड भी हैं और इनके फोल्लोवेर्स लाखो में हैं।

बचपन में शिष्टाचार सीखना कितना जरुरी होता है, ये तन्मय भट्ट और करन तलवार जैसे बिगड़ैल किस्म के लड़कों को देखकर समझ में आता है। अपने विद्यालय के दिनों में अगर हम राज्य के मुख्यमंत्री का नाम बिना श्री लगाए ले लेते थे, तो हमें दंड भुगतना होता था, चाहे मुख्यमंत्री जी चारा घोटाले जैसे संगीन घोटाले में अभियुक्त हो या पूरी तरह से अनपढ़, हमें उनका नाम श्री या श्रीमती के साथ ही लेना होता था। ऐसा नहीं है कि वर्तमान में ये विलुप्त हो गया है। अभी कुछ दिन पहले UP के मुख्यमंत्री जी एक विद्यालय के निरिक्षण में पहुंचे थे और बच्चों से जब उनका परिचय पूछा गया, तो उन्होंने उनका नाम ‘श्री योगी आदित्यनाथ जी’ बताया। ये देखना वाकई सुखद एहसास दे गया। सवाल यह नहीं है कि आप किस विचारधारा से प्रभावित हैं, बल्कि मायने रखता है कि आप बच्चो को कैसा संस्कार और शिष्टाचार सिखाना चाहते हैं। क्योंकि आप जो उनके मानसिक पटल पर लिखेंगे, आगे चलकर वही उनका जड़ बनेगा, भले ही वो किसी भी विचारधारा को अपनाये।

अफ़सोस यह है कि इस तरह की बातों और शिष्टाचार से तन्मय भट्ट जैसे उच्छृंखल युवाओं का दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। ऐसे लोग शिक्षा व्यवस्था और मीडिया पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि जिन्हें मानसिक अस्पताल में होना चाहिए वो यूथ आइकॉन बने कैसे घूम रहे हैं? सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन्हें बढ़ावा भी मिल रहा है। हमारे बीच बैठे राजनितिक बिलौचियों और बिकाऊ मिडिया से, जो फूहड़ता और अश्लीलता को बढ़ावा देते हैं। ये कभी भारत रत्न सचिन तेंदुलकर का मजाक बनाते हैं, तो कभी लता मंगेशकर जी का मजाक बनाते हैं। बेहूदगी की सारी हदें पार करके ये देश के प्रधानमंत्री के चेहरे पर कुत्ते का चेहरा लगाकर मजाक बनाते हैं। इनका ऑनलाइन चैनल AIB का पूरा नाम नहीं ले सकते और इन्होंने AIB रोस्ट के नाम से जो गंदगी किया था, वो इंटरनेट से हटाने के बाद भी आपको कहीं न कहीं दिख जाता है। इस तरह के आवारा किस्म के लड़के हमारे आपके बिच फूहड़ता, अश्लीलता और बेहूदगी को आम बना रहे हैं। ये इंटरनेट की दुनिया के वो वायरस हैं, जिनका दरअसल मानसिक इलाज होना चाहिए कि आखिर वो सामान्य इंसान हैं भी या नहीं। अगर कोई इनको बुद्धिजीवी बना रहा है, तो इनके साथ इनके समर्थकों को भी भरपूर लताड़ना चाहिए। सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इनके घटिया और बेहूदगी से भरे अश्लील चैनल को बंद करवाना चाहिए।

इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी काफी हद तक दुरुस्त है। हमारी संस्कृति 5000 वर्षों से भी पुरानी है और वर्तमान की अधिकांश शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल की पद्धतियों पर आधारित है। यही कारण है कि आज भी देश के अधिकतर विद्यालयों में शिष्टाचार को अहमियत दी जाती है। सारे शिष्टाचार या व्यावहारिक ज्ञान किताबों में बोल्ड करके लिखा नहीं आता, ये वो कुछ आचरण हैं जो बालक अपने गुरुजनों और परिजनों से सीखता है। इसका उल्लेख यहाँ इसलिए आवश्यक था क्योंकि अंतराष्ट्रीय विद्यालय को अपनाता हमारा देश संस्कृति को भूलकर फूहड़ता पड़ोस रही है। आपके बच्चे देश की संस्कृति नहीं सिख पाते और उच्चतर विद्यालय तक आते आते वो अश्लीलता को स्टाइलिश ट्रेंड समझने लगते हैं।

हम युवाओ को यह समझना जरुरी है कि अश्लीलता स्टाइल ट्रेंड नहीं है। हम अपने आने वाली पीढ़ी को संस्कारी देखना चाहते हैं या दुराचारी, ये हमारे आज की गतिविधियों पर निर्भर करेगा। जरुरत है कि हम वायरल होने की बीमारी से बचे, इंटरनेट के सही उपयोग को समझें और अगर हमारे बीच इंटरनेट के जरिये या इसके अलावा भी किसी दूसरे माध्यम से कोई अगर अश्लीलता पडोसकर उसे आम बनाने की कोशिश करे, तो उसे न केवल नकारिये बल्कि उसे हटाए जाने की मांग कीजिये। कुछ बातें परदे में अच्छी लगती हैं, सिर्फ दोस्तों के साथ सहूलियत और सहजता प्रदान करती है। यह अंतर समझना बहुत जरुरी है। इस बात की गाँठ बाँध लीजिये कि तन्मय भट्ट जैसा बेडौल, फूहड़ और वाहियात युवा सिर्फ बर्बादी का उदाहरण बन सकता है, अगर बच्चे या युवा इनमें स्टाइल ट्रेड ढूंढेंगे तो भविष्य चौपट ही बनेगा।

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One thought on “ऑनलाइन संसार – खत्म होता शिष्टाचार

  1. पश्चिमी संस्कृति योग और सनातन धर्म की ओर बढ़ रही है और हमारे fiberals और कॉमी अपनी राजनैतिक लोभ के चलते लोगो को धर्म से दूर करने के लिऐ ऐसी फूहड़ता को प्रोत्साहित कर रहे हैं

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